United Nations Security Council: फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने संयुक्त राष्ट्र की आम सभा की 79वीं बैठक को संबोधित किया. इस दौरान उन्होंने खुलकर भारत को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य बनाने की सिफारिश की है. लेकिन उनकी इस सिफारिश के बाद अब कई सवाल उठने लगे हैं.
राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अपने संबोधन में भारत, ब्राजील और जापान को स्थायी सदस्य बनाने की अपील की. हालांकि रूस भी हमेशा से भारत के स्थायी प्रतिनिधित्व का समर्थन करता रहा है. भारत की आजादी के बाद उसने से रूस ने हमेशा खुले मंच पर यह बात कही है.
सुरक्षा परिषद को ‘आउटडेटेड’ करार दिया
बीते दशकों के दौरान जब भारत की अंतरराष्ट्रीय पटल पर धमक बढ़ी है तो ब्रिटेन और अमेरिका ने भी भारत के स्थायी प्रतिनिधित्व का समर्थन किया है. इतना ही नहीं संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी सुरक्षा परिषद में नए देशों को एंट्री न मिलने के कारण सुरक्षा परिषद को ‘आउटडेटेड’ करार दिया था.
ऐसे में अब सवाल उठ रहा है कि भारत को आखिर स्थायी सदस्य के तौर पर एंट्री क्यों नहीं मिल रही है, कहां पेंच फंसा हुआ है. एक मीडिया रिपोर्ट की मानें तो इस सवाल का जवाब चीन और अमेरिका हैं. इन दोनों देशों की आपसी कुटनिती के कारण भारत के साथ ऐसा होना एक कारण है.
क्या बोले जानकार
रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन अब साउथ चाइना सी और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपने वर्चस्व के लिए भारत को ही खतरा मानता है और भारत की इस समस्या के लिए काफी हद तक अमेरिका जिम्मेदार है. चीन लगातार भारत को वीटो मिलने से रोकने के लिए सुरक्षा परिशद में वीटो कर देता है.
इसी रिपोर्ट में आगे एक राजनीतिक विश्लेषक के हवाले से कहा गया है कि अमेरिका जो इस वक्त भारत को वीटो देने के लिए राजी हुआ है यह स्थिति हमेशा नहीं रहने वाली है. जब भारत की रूस के साथ ज्यादा नजदीकि थी उस वक्त अमेरिका हमेशा विरोध करते रहा है.
उनका कहा है कि अमेरिका पहले ने केवल भारत का विरोध करता था बल्कि अपने सहयोगी देशों का इस्तेमाल भी भारत के खिलाफ किया करता था. वही बनाया हुआ माहौल आज भी है. जबकि पहले ब्रिटेन भी भारत के स्थायी सदस्य बनने का विरोध करता था.


