Doordarshan: जब हम महाभारत पढ़ते हैं तो उसमें कौरवों और पांडवों के बीच हुए युद्ध में संजय द्वारा धृतराष्ट्र युद्ध के मैदान में चल रही गतिविधियों का सारा हाल बताने का जिक्र मिलता है. हालांकि एक वक्त तक इसपर यकीन नहीं किया जा सकता था. लेकिन भारत में 65 साल पहले कुछ ऐसा हुआ जो जिससे महाभारत काल का वह इतिहास जिंदा हो गया. विज्ञान के चमत्कार से लोग आवाज के साथ चलती-फिरती तस्वीरों को देखने लगे.
दरअसल, 15 सितंबर 1959 यानी आज से 65 साल पहले एक छोटे से स्टूडियो से प्रयोग की शुरूआत हुई थी. केवल आधे घंटे का प्रसारण किया गया और यहीं से दूरदर्शन का सफर शुरू हुआ. तब ऑल इंडिया रेडियो के एक स्टूडियो में पहली बार टेलीविजन का प्रसारण हुआ था. तब इसे प्रयोग के तौर पर लाया गया था और ‘टेलीविजन इंडिया’ का नाम दिया गया था. तब सप्ताह में तीन दिन ये प्रसारण किया जाता था, जिसमें विकास और शिक्षा से जुड़े कार्यक्रम दिखाए जाते थे.
दिल्ली से बाहर दूरदर्शन
उस वक्त दिल्ली और आसपास के इलाकों से लोग यह प्रसारण देखने के लिए आया करते थे. इस ब्लैक एंड व्हाइट टेलीविजन के दौर में टीवी सेट खरीदना आम लोगों के बुते के बाहर की बात थी. हालांकि दिल्ली से बाहर दूरदर्शन के सफर को पहुंचने में करीब 13 साल लग गए. पहले बार 1972 में यह प्रदर्शन दिल्ली से बाहर अमृतसर और मुंबई में शुरू हुआ था. इसके तीन साल बाद यानी 1975 में यह सात अन्य राज्यों तक पहुंच गया.
1975 तक यह ऑल इंडिया रेडियो का हिस्सा था. लेकिन 1975 में 16 साल की यात्रा के बाद ‘टेलीविजन इंडिया’ से नाम बदलकर दूरदर्शन कर दिया गया. अगले ही साल सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने अंतर्गत एक नया विभाग आकाशवाणी से अलग करके बना दिया गया. लेकिन 1982 में टेलीविजन ने अपने इतिहास के नए अध्याय की नींव रखी तब पहली बार एशियन गेम्स होने वाले थे और दूरदर्शन पर चलती तस्वीरों में रंग आ गया, यानी 1982 में पहली बार रंगीन प्रसारण की शुरूआत हुई.
इसके बाद दूरदर्शन का विस्तार देश के अलग-अलग हिस्सों में होने लगा. 1984 में ये सफर आगे बढ़ा और ‘हम लोग’ नाम से एक सीरियल की शुरूआत हुई. इसके बाद दूरदर्शन का विस्तार हर साल तेजी से होने लगा. लेकिन इस गांव-गांव तक पहुंचाने का श्रेय ‘महाभारत’ और ‘रामायण’ को जाता है. इनके शुरू होते ही टेलीविजन की बिक्री भारत में खूब हुई. गांव-गांव में लोगों ने नया टेलीविजन खरीदा था. हालांकि तब तक रंगीन टेलीविजन सेट की मांग भी जोर पकड़ने लगी थी.
प्राइवेट चैनलों से चुनौती
1980 के दशक के अंत तक इसका क्रेज इतना बढ़ा कि जिसके घर टेलीविजन नहीं था वो दूसरे के घर जाकर देखता था. 1986 में रामानंद सागर कृत रामायण का प्रसारण दूरदर्शन पर आना लगा था. हर रविवार की सुबह जब रामायण का प्रसारण होता था तो घरों से सड़कों तक सन्नाटा हो जाता था. 1990 के बाद रेडियो की जगह टेलीविजन ने लेनी शुरू कर दी थी. इस दशक के शुरुआती सालों में ही दूरदर्शन के साथ ही प्राइवेट चैनलों की एंट्री हुई और दूरदर्शन को कड़ी चुनौती मिलने लगी.
इसके साथ ही दूरदर्शन और भारत में टेलीविजन के आधुनिकीकरण की शुरुआत हो गई. 1995 में देश में पहला न्यूज चैनल आया और इसके साथ ही टेलीविजन के सफर को नई रफ्तार मिल गई. 2000 का दशक शुरू होते-होते टेलीविजन ने हर मुहल्ले में अपनी जगह बना ली थी. लोग घंटों तक बैठकर टेलीविजन का आनंद लेने लगे थे. इसके बाद साल दर साल इसका सफर बढ़ता चला गया. आज देश में दूरदर्शन का नेटवर्क काफी बड़ा हो गया है. इसके नेटवर्क में अब छह राष्ट्रीय चैनलों के साथ 28 क्षेत्रीय और एक अंतर्राष्ट्रीय चैनल है.
हालांकि बीते दिनों दूरदर्शन को एक विवाद से भी जुड़ गया. तब लोकसभा चुनाव से पहले दूरदर्शन के ऐतिहासिक लोगो का रंग लाल से बदलकर केसरिया कर दिया गया. इस फैसले के बाद विपक्षी दलों ने जमकर आलोचना की थी. तब डीडी न्यूज ने सोशल मीडिया प्लेट्फार्म पर इसका प्रमोशनल शेयर किया था.


